ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब हम हारके भी
खील खिलाके हसा करते थे
ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब हम ईद की खीर चखके
मंदिर की सिडिया चढते थे
ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब दोस्ती को मजहब से कोसो दूर
रखके हम जिया करते थे
ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब हम धर्म जात के किस्सो से
महफुज रहा करते थे
ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब हम, हम थे, ना ब्राह्मण थे
ना हिंदू ना मुसलमान थे
ये बाते हैं उन दिनोंकी
जब लगा था हमे जिंदगी
इतनी सयानी होती है
बचपन गुजरा
औ र संमझ आगयी
हम भी तो एक कथपुतले थे
धर्म की डोर से बंधे हुंए.....
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