Friday, 5 June 2020

ये बाते हैं उन दिनोंकी

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब हम हारके भी
खील खिलाके हसा करते थे

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब हम ईद  की खीर चखके
मंदिर की सिडिया चढते थे

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब दोस्ती को मजहब से कोसो दूर
रखके हम जिया करते थे

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब हम धर्म जात के किस्सो से
महफुज रहा करते थे

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब हम, हम थे, ना ब्राह्मण थे
ना हिंदू ना मुसलमान थे

ये बाते हैं उन  दिनोंकी
जब लगा था हमे जिंदगी
इतनी सयानी होती है

बचपन गुजरा
औ र संमझ आगयी
हम भी तो एक कथपुतले थे
धर्म की डोर से बंधे  हुंए.....

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