Thursday, 11 June 2020

मजहब ...

आज भी याद है वो पल
जब हम थे तुम थे
और कुछ सूनहरे पल थे
प्यार था नजरो मे
दो पल यहा आजाद थे
तब ना थीं ये मजहब
की दीवारे ना ही कोई गम थे
एक दिन लकीर क्या खीच दी
सारे रिश्ते ही बदल गये
तुम हो गये हिन्दू और हम 
मुसलमान बन गये
अब ना था ये मुमकिन
की हम ता उम्र खिल सके
 तुम्हा री  बाहोमे, कहने के लिये
 था सहारा उन चंद लमहो का
 जो हमने गुजारे थे
 ऐसे ही कट गये दीन राते
 आज अचानक बेवक्खत
 वो सारे पल याद आये
 जब मैने पढा किसी पंनो
 पर की मजहब प्यार करना
 सिखाता है....


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