Friday, 5 June 2020

वारकरी

बार बार यह राह चले हम
है कहलाते वारकरी
अलग विलग विचार फिर भी
मंजिल एक सबकी, पंढरी

कोई हरी का नाम लेता
कोई बस चलता जाता
हर कोई अपने धूनमे
काटे ये सफर न्यारी..
मंजिल एक सबकी, पंढरी

राजा कोई, रंक भी यहा
पर सबकी एक ही थाली
एक उनका रहन सहन भी
एकही पथपे चले सवारी
मंजिल एक सबकी, पंढरी

हम भी चले इस राह पर
रूहसे हुई पहचान नयी
हरी के हू ए दर्शन फिर भी
आंखोमे बसे अगली वारी
हम हो गये वारकरी
मंजिल एक सबकी, पंढरी

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